
DPDP कानून पर उठे सवाल
भारत में डिजिटल डेटा की सुरक्षा को लेकर बना नया कानून अब पत्रकारिता की स्वतंत्रता पर बहस के केंद्र में है। सवाल यह है कि नागरिकों की निजता बचाते हुए खोजी पत्रकारिता और जनता के जानने के अधिकार की रक्षा कैसे की जाए।
डिजिटल दौर में हमारी निजी जानकारी—जैसे पहचान, संपर्क विवरण और ऑनलाइन गतिविधियों से जुड़ा डेटा—कई संस्थाओं के पास मौजूद रहता है। इस डेटा की सुरक्षा के लिए भारत ने डिजिटल पर्सनल डेटा प्रोटेक्शन (DPDP) अधिनियम, 2023 बनाया। कानून का उद्देश्य व्यक्तिगत डेटा के इस्तेमाल को नियमों के दायरे में लाना है। लेकिन अब इसके कुछ प्रावधानों को लेकर समाचार प्रकाशकों और सरकार के बीच सवाल उठे हैं।

विवाद की शुरुआत क्या है?
27 अक्टूबर 2026 को Digital News Publishers Association (DNPA) ने सुप्रीम कोर्ट में DPDP अधिनियम और उससे जुड़े नियमों के कुछ प्रावधानों को चुनौती दी। DNPA की दलील है कि कानून में पत्रकारिता के लिए स्पष्ट छूट न होने से खोजी रिपोर्टिंग, पत्रकारों के गोपनीय स्रोतों और जनता के सूचना पाने के अधिकार पर असर पड़ सकता है। सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार से जवाब माँगा और निजता के अधिकार तथा प्रेस की स्वतंत्रता के बीच संतुलन की ज़रूरत पर ध्यान दिलाया। यह अभी सुनवाई की शुरुआत है; अदालत ने कानून को रद्द नहीं किया है। Indian Express की रिपोर्ट
प्रकाशकों की चिंता क्या है?
समाचार संस्थानों का कहना है कि पत्रकारिता में कई बार सार्वजनिक महत्व के मुद्दों की जाँच के लिए लोगों या संस्थाओं से जुड़ी जानकारी जुटानी पड़ती है। यदि डेटा-संबंधी नियमों के कारण ऐसी जानकारी का इस्तेमाल कठिन हो जाए, तो भ्रष्टाचार, सत्ता के दुरुपयोग या सार्वजनिक हित से जुड़े मामलों की रिपोर्टिंग प्रभावित हो सकती है। प्रकाशकों ने यह भी आशंका जताई है कि पत्रकारों के स्रोतों की गोपनीयता कमज़ोर पड़ सकती है।
ये प्रकाशक पक्ष की दलीलें और आशंकाएँ हैं—इन्हें अदालत का अंतिम निष्कर्ष नहीं समझना चाहिए।
सरकार का जवाब
केंद्रीय मंत्री अश्विनी वैष्णव ने कहा है कि DPDP कानून प्रेस की स्वतंत्रता का उल्लंघन नहीं करता और सरकार मीडिया की चिंताओं पर बातचीत के लिए तैयार है। सरकार का पक्ष है कि नागरिकों की निजी जानकारी की रक्षा करना भी ज़रूरी है। Reuters की रिपोर्ट
यहीं इस बहस का मूल प्रश्न सामने आता है: किसी व्यक्ति की निजता की रक्षा करते हुए जनता को सार्वजनिक महत्व की जानकारी कैसे दी जाए?

दोनों अधिकारों के बीच संतुलन क्यों ज़रूरी है?
निजता नागरिकों का महत्वपूर्ण अधिकार है। किसी व्यक्ति की निजी जानकारी को बिना उचित कारण सार्वजनिक करना नुकसान पहुँचा सकता है। दूसरी ओर, स्वतंत्र पत्रकारिता सत्ता और संस्थाओं से जवाब माँगने तथा जनता तक महत्वपूर्ण तथ्य पहुँचाने में भूमिका निभाती है।
इसलिए बहस को केवल “निजता बनाम पत्रकारिता” तक सीमित नहीं करना चाहिए। ज़रूरत ऐसे स्पष्ट नियमों की है जो निजी जानकारी के गैर-जिम्मेदार इस्तेमाल को रोकें, लेकिन जनहित में की जाने वाली पत्रकारिता और उसके स्रोतों के लिए भी उचित सुरक्षा दें।
आगे क्या देखना चाहिए?
सुप्रीम कोर्ट में आगे की सुनवाई यह स्पष्ट कर सकती है कि विवादित प्रावधानों का समाचार संस्थानों पर क्या असर पड़ता है और निजता तथा प्रेस की स्वतंत्रता के बीच संतुलन कैसे बनाया जा सकता है। फिलहाल अदालत ने केंद्र से जवाब माँगा है; अंतिम निर्णय आना बाकी है।
DPDP अधिनियम का घोषित उद्देश्य डिजिटल व्यक्तिगत डेटा की सुरक्षा और उसके वैध इस्तेमाल के लिए व्यवस्था बनाना है। India Code पर कानून का विवरण अब चुनौती यह है कि इस व्यवस्था में नागरिकों की निजता के साथ-साथ जनहित की पत्रकारिता के लिए भी स्पष्टता और भरोसा कैसे कायम हो।
मेरी राय में, इस बहस का समाधान किसी एक पक्ष को चुप कराने में नहीं, बल्कि साफ़ और संतुलित नियम बनाने में है। नागरिकों की निजी जानकारी सुरक्षित रहनी चाहिए, और पत्रकारों को जनहित के मुद्दों की तथ्य-आधारित जाँच करने का अवसर भी मिलना चाहिए। लोकतंत्र में इन दोनों ज़रूरतों का सम्मान करना ही इस विवाद की असली कसौटी है।

